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सौ साल के बाद आरएसएस क्‍लीन बोल्‍ड

विदेश में विचारधारा से पल्‍टे मोहन भागवत

विशेष संवाददाता

     शिमला : अमेरिका में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (आरएसएस) प्रमुख मोहन भागवत के एक बयान से ही आरएसएस अपने सौ वर्ष में क्लीन बोल्ड हो गई। भागवत के बयान के यह मायने निकाले जा रहे हैं कि वह आरएसएस की हिन्दू राष्ट्र वाली छवि से पलट गए हैं।
     न्यूयार्क अमेरिका में भागवत के विदेशी दौरे के दौरान पहले से ही उनकी आलोचना शुरू हो गई थी। इसी प्रकार की आलोचना भागवत को कनाडा और ब्रिटेन में भी झेलनी पड़ी थी। एक समय तो ऐसा लग रहा था कि शायद भागवत के कार्यक्रम हो ही न पाएं। आखिर भागवत अमेरिका में मंच पर चढ़े और ऐसा भाषण दे डाला जैसा आरएसएस के सौ साल के इतिहास में किसी भी प्रमुख का नहीं है। भागवत ने कहा कि जो लोग भारत में मुसलमानों को बर्दाश्त नहीं कर पाते हैं वह हिन्दू ही नहीं हैं। पिछले सौ वर्षों में आरएसएस ने दुनियां भर में अपनी जो पहचान बनाई थी वह सिर्फ हिन्दुओं को साथ लेकर चलने की थी।
     आजादी के आंदोलन में आरएसएस का टकराव कांग्रेस से इसी बात को लेकर रहा है कि कांग्रेस ने भारत को एक धर्मनिपेक्ष राष्ट्र बनाने की ओर कदम बढ़ाए थे। जबकि आरएसएस भारत को एक हिन्दू राष्ट्र बनाना चाहती थी। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की हत्या के पीछे भी आरएसएस की यही सोच बताई जाती है। देश के पहले प्रधानमंत्री पं. जवाहर लाल नेहरू का नाम लेने पर आग बबूला हो जाने वाले आरएसएस के लोग मोहन भागवत की जुबान से न्यूयार्क में मुसलमानों के पक्ष में दिए गए बयान को कैसे पचा रहे होंगे यह वह हर व्यक्ति समझ सकता है जिन्होंने देश भर में फैले स्वयं सेवकों की भाषा को कहीं पर भी मुसलमानों के खिलाफ सुना होगा। हैरानी की बात यह है कि अपनी सौ वर्षों की विचारधारा के खिलाफ अपने ही संगठन के प्रमुख भागवत के भाषण को वह कैसे बर्दाश्त कर रहे होंगे, जो आरएसएस के अस्तित्व को ही समाप्त कर देने की ओर जाती है।
     भागवत का भाषण सुनने के बाद तो यह भी लगता है कि अगर आरएसएस की यह विचारधारा है जैसे मोहन भागवत न्यूयार्क में बताते हैं तो आरएसएस को बनाने की जरूरत ही क्या थी। अपने सौ वर्ष के इतिहास में आरएसएस ने सिर्फ हिन्दुओं को संगठित करने और हिन्दु राष्ट्र बनाने के लिए ही कार्य किया है। इसी सोच ने आरएसएस को एक नफरती संगठन में तब्दील कर दिया है। यह बात तो कांग्रेस पार्टी अपने जन्म के समय से ही कहती आ रही है कि भारत में हिन्दु, मुसलमान, ईसाई और अन्य धर्म के लोगों को मिलजुलकर प्रेम से रहना है। आखिर आरएसएस में जो उबाल है क्या वह ठंडा पड़ गया है। जो मोहन भागवत विदेश की धरती पर उतरते ही पूरी तरह सेकुलर हो गए हैं, या कहीं मौजूदा हालात ने मोहन भागवत को इस स्थिति में तो नहीं पहुंचा दिया है कि वह अब आरएसएस के वजूद को बचाने का प्रयास सेकुलर बनकर करने लगे हैं।
     अब भागवत विदेश दौरे से लौट चुके हैं और भारत में लोग यह सोचने पर मजबूर हैं कि कहीं भागवत के ‘दांत खाने के और और दिखाने के और’ तो नहीं हैं। वह भारत में रहकर तो हिन्दुत्व की टांग पकड़े रहेंगे और विदेश के भूमि में पूरी तरह सेकुलर बन जाएंगे। यह बात भी पूरा विश्व जानता है कि आरएसएस से निकले प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी विदेशी धरती पर तो अपनी धर्मनिर्पेक्ष छवि को चमकाना चाहते हैं और पूरे विश्व को बताते हैं कि ‘भारत में सब चंगा सी’ लेकिन भारत में वह सिर्फ हिन्दुओं को ही वोट का अधिकार से लेकर अन्य सभी लाभ देना चाहते हैं। तभी उन्होंने एसआईआर में काटे गए करोड़ों लोगों के वोट पर एक शब्द तक नहीं कहा। यही नहीं देश में बढ़ रही संप्रदायिका पर भी वह मौनधारण किए रहते हैं।
     फिलहाल मोहन भागवत के इस यू-टर्न की असलियत भी कुछ दिनों में पूरी तरह से पूरे विश्व के सामने आ जाएगी। पर मौजूदा दौर में भागवत के बयान से यही लग रहा है कि उन्हें इस बात का खौफ सताने लगा है कि जब कभी भी नरेन्द्र मोदी की सत्ता जाएगी तो इसकी गाज आरएसएस पर ही पड़ेगी और उनके लिए भागवत ही सबसे बड़े जिम्मेदार कहलाएंगे।।

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