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दो
भागों में बंटकर रह गया है
शूलिनी मेला
एक मेला लगता है बाजार में, एक
ठोडो मैदान में
विशेष संवाददाता
सोलन
: समय के साथ साथ शूलिनी मेला भी दो भागों में बंटकर रह गया है।
एक भाग भक्तिभाव से ओत प्रोत होता है और दूसरा हो-हुल्लड़बाजी में डूबा हुआ। कहा
जा सकता है सोलन के बाजार में लगने वाला शूलिनी मेला मां शूलिनी की पालकी के
नगर भ्रमण के साथ संपन्न होता है और दूसरा सोलन के ठोडो मैदान में जहां लूटपाट
का साम्राज्य कायम रहता है।
दो भागों में विभाजित हो चुके इस मेले में जहां निशुल्क
भंडारे लगाए जाते हैं वहीं ठोडो मैदान में आम जनता से एकत्र पैसे उड़ाए जाते
हैं। सोलन के लोग जहां बाजार में लगने वाले मेले को ही असली मेला मानते हैं।
वहीं ठोडो मैदान में मेले के दौरान जहां झूले से लेकर स्टालों की लूटपाट होती
है उसके चरचे सुनाए जाते हैं। जिला प्रशासन ठोडो मैदान से जहां करोड़ों रुपए की
उगाही करता है वहीं मां शूलिनी के नाम पर जिला भर से चंदा एकत्र किया जाता है।
शूलिनी मेले के दौरान उद्योगपतियों, फैक्टरी वालों, ट्रक,
बस, ओटो और टैंपो से लेकर कई संस्थाओं से इस प्रकार चंदा उगाही की जाती है कि
वह शूलिनी मेले में चंदा देने के बाद तौबा कर लेते हैं। जिला प्रशासन ने सोलन
जिला में चंदा देने वालों को ‘सोशल ऑबलिगेशन’ शब्द ही भुला दिया है। जिला के
छोटे छोटे गांवों में कई तरह के मेले और कार्यक्रम होते हैं। ऐसे कार्यक्रम भी
दुकानदारों और व्यापारियों के चंदे से ही चलते हैं। लोग जब आपे छोटे से
कार्यक्रम के लिए चंदा मांगने जाते हैं तब व्यापारी अपनी व्यथा बताते हैं कि
फलां अफसर का फोन आया था और उसे हमने अपनी क्षमता से ज्यादा चंदा दे दिया है।
यह बात किसी से छुपी हुई नहीं है कि मां शूलिनी के नाम पर जिला प्रशासन किस
प्रकार चंदा उगाही करता है। और इस चंदा उगाही के पीछे मां शूलिनी के नाम पर
ठोछो मैदान में आयोजित होने वाले हो-हुल्लड़ वाजे कार्यक्रम ही हैं।
वरना बाजार में लगने वाले मां शूलिनी के मेले में तो
निशुल्क भंडारे का लोग जमकर आनंद लेते हैं। मां शूलिनी भी बाजार तक ही पालकी
में बैठकर आती है और ठोडो ग्राउंड की ओर तो निगाहें भी नहीं डालती है। इस
कार्यक्रम में तो जिला प्रशासन का नाम मात्र भी पैसा खर्च नहीं होता है। लोग
अपनी श्रद्धा से ही लाखों रुपयों के भंडारे लगाते हैं यही नहीं बाजार में गंदगी
न फैले इसके लिए अलग से सफाई शुल्क भी अदा करते हैं।
मां शूलिनी के भारी भरकम बजट वाले कार्यक्रमों और
प्रदर्शनियों में लोगों को बुला बुलाकर आयोजक थक जाते हैं और कोई वहां नहीं
जाता है। जबकि बाजार के मेले में किसी को बुलाना नहीं पड़ता है लोग खुद चलकर आते
हैं और यहां लगने वाले निशुल्क भंडारों में सैंकड़ों की संख्या में खड़े रहते
हैं। जिला प्रशासन को भी चाहिए कि वह भारी भरकम बजट वाले मेले को कुछ कम करे और
सांस्कृतिक कार्यक्रमों में स्थानीय कलाकारों को ही बुलाए और उन्हें अच्छी
पेमेंट भी दे। जहां तक शूलिनी मेले में बुलाए जाने वाले तथाकथित बड़े बड़े
कलाकारों का प्रश्न है उन्हें लोग यू-ट्यूब और सोशल मीडिया में देखते ही रहते
हैं उनके कुछ गानों पर लोगों से एकत्र किया गया लाखों रुपया खर्च करने का कोई
लाभ नहीं है। यह कार्यक्रम तो बड़ी एलइडी लगाकर भी युवाओं को ठोडो मैदान में
दिखाया जा सकता है और युवा उनसे भी अच्छे कलाकारों के गीतों पर थिरक सकते हैं।
कुल मिलाकर जिला प्रशासन के लिए भी यह बेकार की सिरदर्दी बनकर रह गया है और वह
इसे मात्र औपचारिकता वश निभाने को मजबूर है।
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गंज बाजार में होता था मेला
सोलन
: क्या आप जानते हैं कि 1950-60 के दशक में शूलिनी मेला गंज बाजार के दुर्गा
मंदिर के पीछे सीधे बड़े खेतों में आयोजित किया जाता था। इस स्थान को अखाड़ा के
नाम से जाना जाता था। समय के साथ शहर बड़ा होता चला गया। अब यहां मकान ही मकान
बन गए हैं। इसलिए पिछले करीब पचास साल में इसका आयोजन ठोडो मैदान में होता है।
समय के साथ मेला मनाने का अंदाज भी बदल गया है। किसी जमाने में किसान इस शूलिनी
मेले में घी, शहद, ऊन अदरक व आलू व अन्य चीजें बेचने के लिए लाते थे और घर का
अन्य सामान यहां से खरीदकर ले जाते थे।
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