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सोलन के व्यापारियों को बड़ी मार पड़ती है दस दिन तक स्टाल लगवाना व्यापारियों के हित में नहीं... विशेष संवाददाता सोलना : इस बार मां शूलिनी के मेले में बाहर से सामान लाकर स्टालों के जरिए दस दिन तक बिकवाने की मार स्थानीय व्यापारियों पर लंबे समय तक पड़ेगी। सोलन में पर्यटन का सीजन चल रहा है। लोग बाहर से यहां की ठंडी हवाओं में सुकून महसूस करते हैं। लेकिन इस मौसम की मार भी स्थानीय व्यापारियों पर मेले के कारण पड़ने लगी है। बाहर से आने वाले लोग अब मेले के स्टालों में जाकर खरीददारी कर लेते हैं। जबकि यदि मेले के स्टाल कम दिनों के लिए दिए जाते तो व्यापारियों को अपने गर्मी के सीजन का माल बेचने की आसानी रहती।पहले ही स्थानीय व्यापारी ऑन लाइन शॉपिंग से परेशान हैं। बची खुची कसर मेले पर दस दिन तक सामान बेचने वाले स्टालों को लगवाकर पूरी कर दी गई है। वैसे भी सर्दी के मौसम में यहां के दुकानदारों का सामान ज्यादा नहीं बिक पाता है। शीतकालीन छुट्टियां होने के कारण भी बहुत से लोग यहां से बाहर चले जाते हैं। जिसका असर दुकानदारों की कमाई पर पड़ता है। मुश्किल से अप्रेल-मई में वह दुकानदारी कर पाते हैं। फिर जून से मेला और फिर बरसात के बाद सर्दी क्षेत्र को अपने आगोश में लेने लगती है। ऐसे में दुकानदार कब कमाई करेगा और कैसे साल भर अपने परिवार को पालेगा यह चिंता किसी को भी नहीं है। मेले में दस दिन तक टाल लगने के कारण जिला प्रशासन शूलिनी मेला कमेटी को भले ही चंद पैसों का लाभ हो जाता होगा, लेकिन इसके पीछे कितने कारोबारियों के लिए परेशानी खड़ी हो जाती है, इस पर पुनर्विचार करना जरूरी है। यदि गौर ये देखा जाए तो सोलन में इस प्रकार के व्यापारिक मेले आयोजित करने का रिवाज सा चल पड़ा है। जरा सा मौसम ठीक होता है तो यहां कोई न कोई व्यापारिक मेला लग जाता है, जिसका सीधा नुक्सान सोलन के व्यापारी को होता है। लोग मेले में ही अपनी चप्पल, जूते, कपड़े, फर्नीचर, कॉसमेटिक, शेपीस और अन्य तरह का सामना खरीद लेते हैं। ऐसे में सोलन की दुकानें कैसे चलेंगी और वह कैसे अपना जीवनयापन करेंगे। मेले में जब से भंडारों का प्रचलन शुरू हुआ है तब से रेस्तरां, होटल और खानपान का व्यापार करने वालों का बंटाघार हो चुका है। अब जूते चप्पल और कपड़े के व्यापारियों पर भी ग्रहण लग चुका है।लोग बाहर से आते हैं अपना माल बेचते हैं और पैसा कमाकर चले जाते हैं। वह स्थानीय दुकानदारों के मुकाबले सरकार को कितना टैक्स देते हैं यह तो राम ही जाने। लेकिन वह जो नगर का तानाबाना बिगाड़ कर चले जाते हैं। इसकी सबसे बड़ी मार उन युवाओं पर पड़ती है जो बेरोजारी के इस युग में कोई कारोबार करने की सोच रहा होता है। बार बार मेले लगाकर बाहर के दुकानदारों को मुनाफा कमवाकर स्थानीय प्रशासन और सरकार क्षेत्र का कितना बड़ा अहित कर रही है इसका अंदाजा शायद किसी को नहीं है। अर्थशास्त्र में सबसे बड़ी कड़ी रुपए के घूमने को माना जाता है। जैसे सोलन के एक व्यापारी ने सोलन से मुनाफा कमाया तो वह उस मुनाफे को अपनी अन्य जरूरतों के हिसाब से सोलन के अन्य दुकानदारों से सामान खरीदेगा। इस प्रकार सोलन का पैसा सोलन में ही घूमता रहेगा और सबकी जरूरतें पूरी होती रहेंगी। अब एक व्यापारी दस दिन के लिए सोलन में आया और लाखों रुपया कमाकर अपने घर चला गया। यह पैसा तो सोलन नगर के प्रचलन से बाहर हो गया। ऐसे में सोलन की आर्थिक साइकिल तो टूट गई। सरकार को इस अर्थशास्त्र को समझना होगा और सभी लोग जिंदा रह सकें और करोबार कर सकें इसके लिए ही उन्हें सोजना अनानी चाहिए। यदि अधिकारी ऐसा सोचते हैं कि हम तो बाहर से आए हैं और हमें तो अपनी नौकरी से मतलब है तो यह सोच राष्ट्रहित में नहीं कही जा सकती है। |
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