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धार्मिक
आस्था बनी रहे
संजय हिंदवान
यूं तो आजकल धार्मिक आस्था पर बड़ी चोट पड़ी पड़ी है। भगवान
राम के मंदिर से चंदा चोरी की खबरों ने धार्मिक आस्था को बड़ी ठेस पहुंचाई हैं।
इस दौरान सोलन में मां शूलिनी का मेला भी आ गया है। यहां लोगों की धार्मिक
आस्था अभी तक बरकरार है। सोलन के लोगों का अटूट विश्वास है कि मां शूलिनी
उन्हें आशीर्वाद देती है और उनके कष्टों को हर लेती है। हमारी भी कामना यही है
कि यह आस्था और विश्वास लोगों में बना रहे।
हम सभी को शूलिनी मां के इस पवन मेले पर हार्दिक
शुभकानाएं देने के साथ उन्हें यह बाताने का प्रयास भी करते हैं कि लोग क्या
करें और क्या न करें ताकि यह धार्मिक आस्था सदा बनी रहे। मां शूलिनी को मां
दुर्गा, भगवती और सरस्वती का ही रूप माना जाता है। मां शूलिनी को यहां मां
दुर्गा की छोटी बहन के रूप में माना जाता है। परंपरा के अनुसार मां शूलिनी अपनी
बहन मां दुर्गा से मिलने के लिए जाती है और इसी उपलक्ष्य में यहां मां शूलिनी
का मेला मनाया जाता है। इसमें लाखों श्रद्धालु भाग लेते हैं और मां का आशीर्वाद
प्राप्त करते हैं।
सोलन का शूलिनी मेला हर साल आषाढ़ (जून) माह में लगता है।
पूर्व बघाट (सोलन) रियासत के शाही परिवार की अधिष्ठात्री देवी मां शूलिनी के
प्रति सम्मान, श्रद्धा व आस्था जताने के लिए यह सालाना आयोजन होता है। मेले के
पहले रोज शूलिनी माता सोलन गांव से सोलन नगर में अपनी बड़ी बहन दुर्गा मात से
उनके गंज बाजार स्थित मंदिर में मिलने के लिए दो दिन के प्रवास के लिए आती है।
बड़े-बूढ़ों के मुताबिक मां शूलिनी के नाम पर इस नगर का नाम
‘सोलन’ पड़ा था। बघाट रियासत के शासक पंवार वंशज राजपूत शक्ति पूजा में बहुत
आस्था रखते थे। अपनी कुलदेवी के प्रति उन्हें अटूट श्रद्धा थी। इसलिए सदियों
पूर्व बघाट के अस्तित्व में आने के साथ ही इस मेले का आयोजन शुरू हो गया। कहते
हैं यहां के राजा विक्टोरिया दलीप सिंह और कंवर दुर्गा सिंह सभी धर्मों का आदर
करते थे और हिन्दु धर्म के पर्वों पर सभी धर्म के लोगों को आमंत्रित भी करते
थे। यही परंपरा आज भी कायम है। आजादी के समय जब देश भर में हिन्दु और मुस्लिम
समुदाय के लोग एक दूसरे का कत्ल करने पर उतारू थे। उस समय कंवर दुर्गा सिंह ने
टैंक रोड स्थित लड़कों के स्कूल में मुसलमानों के लिए राहत शिविर लगाया था।
जिससे यहां रहने वाले कई मुसलमानों की जान बचाई गई थी। कहने का अर्थ यह है कि
सोलन नगर की परंपरा में सभी को सम्मान देने का भाव सदियों पुराना है। जिस भाव
को सदा जिंदा रखने का प्रयास यहां रहने वाले हर नागरिक को आज भी करना चाहिए। इस
वर्ष भी मेले में यही परंपरागत भावना देखने को मिली। मां शूलिनी की शोभायात्रा
में सभी धर्मों के लोगों ने इसमें अपना योगदान दिया। पूरे नगर में हजारों लोग
एकता के सुर में मेले का आनंद लेते हुए नजर आए।
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