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केवल गाली एससी एसटी एक्‍ट में अपराध नहीं

गाली जाति को नीचा देखाने के लिए जरूरी...

     सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि केवल अपमानजनक या गाली गलौज वाली भाषा का इस्तेमाल अपने आप में अनुसूचित जाति (एससी) एवं अनुसूचित जनजाति (एसटी) अत्याचार निवारण अधिनियम के तहत अपराध नहीं माना जा सकता। शीर्ष अदालत ने कहा कि इस कानून के तहत अपराध के दायरे में आने के लिए यह साबित होना चाहिए कि वह कृत्य किसी व्यक्ति को उसकी जाति के आधार पर अपमानित करने के विशेष इरादे से किया गया हो।
     जस्टिस जेवी पारदीवाला और जस्टिस जस्टिस आलोक अराधे की पीठ ने कहा कि केवल यह तथ्य कि पीड़ित अनुसूचित जाति या जनजाति से संबंधित है, यह पर्याप्त नहीं है। पीठ ने यह टिप्पणी करते हुए एक अपीलकर्ता के खिलाफ चल रही आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया। अदालत ने पाया कि न तो प्राथमिकी और न ही आरोपपत्र में यह आरोप था कि अपीलकर्ता ने किसी जाति आधारित अपमान या धमकी का कृत्य किया। शीर्ष अदालत पटना हाईकोर्ट के आदेश के खिलाफ दायर अपील पर सुनवाई कर रही थी।
     हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के समन आदेश में हस्तक्षेप करने से इन्कार कर दिया था। आरोप था कि आंगनवाड़ी केंद्र में हुई एक घटना के दौरान शिकायतकर्ता (अनुसूचित जाति) के साथ जातिसूचक गालियां दी गई और मारपीट की गई।
     अपीलकर्ता पर भारतीय दंड संहिता की धाराएं 341, 323, 504, 506, 34 तथा एससी/एसटी कानून की धारा 3(1) (आर) और 3(1) (एस) के तहत आरोप लगाए गए थे। सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि आरोप अस्पष्ट और सामान्य हैं और किसी विशेष आपराधिक कृत्य का स्पष्ट उल्लेख नहीं है। अदालत ने धारा 3(1) (आर) की व्याख्या करते हुए कहा कि इस अपराध के लिए दो शर्तें अनिवार्य हैं। पहली, शिकायतकर्ता का अनुसूचित जाति या जनजाति का सदस्य होना और दूसरी, अपमान या धमकी केवल जातिगत पहचान के कारण दी गई हो।
     इसी तरह धारा 3(1) (एस) के संदर्भ में अदालत ने कहा कि आरोपों में यह स्पष्ट होना चाहिए कि जाति के नाम से सार्वजनिक रूप से गाली दी गई और वह गाली जाति को नीचा दिखाने के इरादे से दी गई हो। इन तथ्यों के आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि प्राथमिकी और आरोपपत्र में ऐसा कोई संकेत नहीं है जिससे यह साबित हो कि अपीलकर्ता का कृत्य जाति आधारित अपमान से प्रेरित था। लिहाजा शीर्ष अदालत ने अपीलकर्ता के खिलाफ चल रही आपराधिक कार्यवाही को समाप्त कर दिया।

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