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आईएएस अधिकारियों के खिलाफ टिप्‍पणी गलत

मंत्रियों को पहले मंत्रिपरिषद में मामले सुलझाने चाहिए...

विशेष संवाददाता

     शिमला : हिमाचल प्रदेश मंत्रिपरिषद के कुछ सदस्यों द्वारा आईएएस अधिकारियों के खिलाफ जो परोक्ष या अपरोक्ष रूप से टिप्पणियां की जा रही हैं वह गलत हैं। पिछले दिनों हिमाचल में मंत्रिपरिषद के कुछ मंत्रियों में आईएएस अधिकारियों के खिलाफ रोष देखने को मिला है।
     कहते हैं कि प्रदेश के उप-मुख्यमंत्री मुकेश अग्निहोत्री ने इसकी शुरुआत मंडी रैली के खुले मंच से की थी। तब मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू भी मंच पर विराजमान थे। फिर इसी बात को लेकर लोक निर्माण विभाग के मंत्री विक्रमादित्य सिंह ने बात को नए सिरे से शुरू किया। इस बार इस मामले में प्रतिक्रिया काफी तीव्र हुई है। हिमाचल की मंत्रिपरिषद दो भागों में बंटी हुई नजर आ रही थी। प्रदेश की आईएएस और आईपीएस लॉबी ने इस पर प्रतिक्रिया व्यक्त की है।
     कहा जा सकता है कि अपनी ही मंत्रिपरिषद से ऐसे सदस्यों को कुछ शिकायतें हैं जिन्हें मंत्रिपरिषद की बैठकों में नहीं सुना जा रहा है। जाहिर है तभी मंत्रिपरिषद के सदस्यों को यह बात सार्वजनिक रूप से कहनी पड़ रही है। हलांकि यह बात मंत्रिपरिषद तक ही सीमित रहती तो ज्यादा अच्छा होता। अब मामला सबके सामने आ ही गया है तो इस पर गंभीर चिंतन किया जाना भी जरूरी है।
     आईएएस और आईपीएस के खिलाफ की जा रही टिप्पणी अच्छी नहीं है। खास तौर पर यह कहना कि वह बाहरी राज्यों से आते हैं और हिमाचल के हितों की रक्षा मन से नहीं करते हैं। हो सकता है कि कुछ मामलों में ऐसा हो लेकिन इससे पूरे सिस्टम को ही खराब बता देना भी अच्छा नहीं है। सभी जानते हैं कि कोई भी अधिकारी चाहे वह आईएएस हो, आईपीएस हो, एचएएस हो या फिर एचपीएस हो सभी भारत के संविधान के तहत अपनी ड्यूटी को अंजाम देते हैं। यदि सरकार अधिकारी को गलत समझती है तो वह भारत के संविधान के अनुच्छेद 311 को इस्तेमाल करके किसी भी अधिकारी को सेवा से बर्खास्त भी कर सकती है। इसमें तो अधिकारी को सफाई देने का प्रावधान भी नहीं है। हलांकि इस अनुच्छेद का इस्तेमाल सरकार चिट्टे में पकड़े कास्टेबलों पर कर रही है।
     सभी अधिकारियों कर्मचारियों पर नियंत्रण मंत्रिपरिषद या संबंधित विभाग के मंत्री का होता है। मंत्रिपरिषद जिसे प्रदेश सरकार कहा जाता है वह अपने तमाम कार्यों के लिए राज्य विधानसभा के प्रति जवाबदेही होती है। यदि फिर भी किसी अधिकारी की कार्यप्रणाली में किसी को कोई दोष नजर आता है तो वह अपनी बात को लोकतांत्रिक तरीके से उपरोक्त मंचों पर उठा सकता है।
     यहां गौर करने लायक बात यह भी है कि क्या मंत्री यह भी जानते हैं कि वह अधिकारियों से संविधान और कानून के दायरे में काम करते हैं या नहीं। यहां यह बात भी स्पष्ट हो जानी चाहिए कि किसी भी अधिकारी को संविधान और कानून के दायरे में काम करना चाहिए। उसे इस बात की परवाह नहीं करनी चाहिए कि उसे जो असंवैधानिक कार्य करने के लिए कहा जा रहा है उसे वह स्पष्ट रूप से मना कर सके। अगर किसी मंत्री ने अधिकारी को संवैधानिक कार्य करने के लिए कोई लिखित आदेश दिया है तो वह इसका जवाब स्पष्ट रूप से उक्त अधिकारी से मांगने का हक रखता है और यदि अधिकारी का जवाब संविधान और कानून के खिलाफ आता है तो उस अधिकारी के खिलाफ विभागीय जांच की कार्यवाही को आगे बढ़ा सकता है। ऐसे में यदि मंत्री यह कहते हैं कि उनकी बात को आईएएस और आईपीएस अधिकारी नहीं मान रहे हैं तो उसमें जरूर कुछ ऐसी कमियां होंगी जो वह जनहित के कार्यों को करवाने में असफल है। इसके अतिरिक्त और भी कई कानूनी रास्ते हैं जो अधिकारियों को मंत्री के आदेशों की अवहेलना करने पर कटघरे में खड़ा कर सकते हैं।

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