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राज्यपालों को क्या हो गया
विशेष संवाददाता
शिमला
: देश भर के राज्यपालों को ये क्या हो गया है। वह विपक्ष की राज्यों में
गठित लोकतांत्रिक सरकारों के प्रति अपनी आंखें तरेरने लगे हैं। बंगाल, पंजाब और
महाराष्ट्र सहित कई राज्यों में राज्यपालों की भूमिका का देशवासियों ने देख
लिया है। यह बात भी अब कही जा सकती है कि राज्यपाल अपने संवैधानिक दायित्वों का
निर्वाह नहीं कर रहे हैं।
केरल और तमिलनाडु के बाद अब नया विवाद कर्नाटक में भी सरकार और राज्यपाल
थावरचंद गहलोत के बीच टकराव सामने आ गया है। राज्यपाल ने विधानमंडल के संयुक्त
सत्र में अपने संबोधन की सिर्फ दो पंक्तियां पढ़ी और भाषण समाप्त कर दिया। जबकि
वह ऐसा नहीं कर सकते हैं। सरकार द्वारा दिया गया संबोधन पढ़ना राज्यपालों की
संवैधानिक बाद्यता है। इस पर मुख्यमंत्री सिद्धरमैया ने कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त
की है।
मुख्यमंत्री ने बताया कि वह सरकार की ओर से तैयार भाषण की बजाय अपना तैयार किया
भाषण पढ़कर चले गए। पिछले दो दिन में दक्षिण भारत के गैर भाजपा शासित राज्यों
में राज्यपाल और सरकार के बीच टकराव की यह तीसरी घटना है। इससे पहले कर्नाटक के
अलावा पड़ोसी केरल और तमिलनाडु में भी ऐसा हो चुका है। विधानसभा और विधानपरिषद
के संयुक्त सत्र में अपने संक्षिप्त भाषण के बाद गहलोत बाहर निकल गए। कांग्रेस
सदस्यों ने पूरा अभिभाषण पढ़े बिना राज्यपाल के चले जाने पर कड़ी नाराजगी जताई और
सदन में इसके खिलाफ नारे लगाए। वहीं, राज्यपाल का बचाव करते दिख रहे भाजपा के
सदस्यों ने भारत माता की जय के नारे लगाए। इससे पहले गहलोत ने राज्य विधानमंडल
के संयुक्त सत्र को संबोधित करने से इन्कार ही कर दिया था। कहा गया कि उन्होंने
अभिभाषण में मनरेगा को केंद्र की ओर से निरस्त किए जाने संबंधी कुछ संदर्भों पर
आपत्ति जताई थी। राज्यपाल के इस वक्तव्य से स्पष्ट है कि वह केन्द्र सरकार के
इशारे पर कार्य कर रहे हैं।
जब राज्यपाल इस तरह का आचरण राज्य सरकारों के साथ करते तो इस बात की शिकायत
राष्ट्रपति से की जाती है और उन्हें पद से हटाने की मांग की जा सकती है। यहां
विडंबना यह है कि राष्ट्रपति की शक्तियों को भी केन्द्र सरकार इस्तेमाल करती
है। इससे राज्यपालों के हौंसले बढ़ गए हैं और वह भारत के संविधान की तनिक भी
इज्जत नहीं कर रहे हैं। उन्हें मालूम है कि केन्द्र सरकार अपने पक्ष के
राज्यपालों के खिलाफ कोई कार्यवाही नहीं करेगी। कहा जा सकता है कि केन्द्र
सरकार के इशारे पर भारत के संविधान की धज्जियां राज्यों में भी राज्यपालों
द्वारा उड़ाई जा रही है। अब मुख्यमंत्री सिद्धरमैया ने भी आरोप लगाया दिया है कि
राज्यपाल केंद्र सरकार के हाथों की कठपुतली की तरह काम कर रहे हैं। यह संविधान
के अनुच्छेद 176 और 163 का स्पष्ट उल्लंघन है। हम इस पर विचार कर रहे हैं कि
सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया जाए या नहीं। भारत के संविधान का संरक्षक
सुप्रीम कोर्ट है इसलिए शायद सिद्धरमैया को आस है कि सुप्रीम कोर्ट उनकी बात
सुनेगा और संविधान की सुरक्षा के लिए कोई आदेश उनके पक्ष में पारित करेगा।
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